कुछ लड़ाइयाँ अंदर भी चल रही होती हैं…
रात के 2 बजे थे। Screen की रोशनी कमरे में थी… लेकिन दिमाग में सिर्फ pressure था।
Browser tabs अब भी खुले थे। Analytics dashboard सामने था। लेकिन numbers देखने की हिम्मत खत्म होने लगी थी।
हर notification अब सिर्फ एक sound नहीं रही थी। दिल अचानक तेज़ धड़कने लगता था — “अब क्या हुआ होगा…”
धीरे-धीरे समझ आया कि website सिर्फ एक project नहीं रह गई थी। उसमें उम्मीदें थीं। जिम्मेदारियाँ थीं। और वह भरोसा था जो इंसान खुद पर रखता है।
बाहर से सब normal दिखता था।
Website online। Posts live। Screenshots मौजूद।
लेकिन अंदर बहुत कुछ टूट रहा था।
वे बस रातों की नींद में, आँखों की थकान में, और चुप रहने की आदत में बदल जाते हैं।
सबको लगता है founder strong होता है। शायद होता भी है।
लेकिन strong लोग भी कई बार चुपचाप टूट रहे होते हैं — बिना किसी को बताए।
और शायद वहीं से rebuilding शुरू हुई। धीरे-धीरे। शांत तरीके से। बिना शोर किए।
क्योंकि कुछ लड़ाइयाँ दुनिया से नहीं… खुद को टूटने से बचाने के लिए लड़ी जाती हैं।

कोई टिप्पणी नहीं:
एक टिप्पणी भेजें